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Himachal Culture: दीपावली से एक माह बाद हिमाचल के इस जिले में आज मनाएंगे बूढ़ी दिवाली, जानिए क्या है परंपरा

जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में वीरवार से एक सप्ताह तक मनाया जाने वाला बूढ़ी दिवाली का त्योहार शुरू हो गया है। बुधवार शाम से ही क्षेत्रवासियों ने बूढ़ी दिवाली की सभी तैयारियां पूरी कर ली थी। आज से सभी ग्रामीण अपने अपने गांव में एक स्थान पर एकत्रित होकर बूढ़ी दिवाली मनाएंगे। ग्रामीण पारंपरिक लोक नृत्य भी प्रस्तुत करते हैं।

154 पंचायतें एकसाथ मनाएंगी बूढ़ी दिवाली

सिरमौर जिला का गिरिपार क्षेत्र आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं को बखूबी निभा रहा है। यहां 154 से अधिक पंचायतों में बूढ़ी दिवाली मनाए जाने की एक अनूठी परंपरा है। दीपावली के एक महीने बाद अमावस्या की रात को गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली को पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में बूढ़ी दिवाली को मशराली के नाम से जाना जाता है। बूढ़ी दीपावली का त्योहार गिरिपार और उत्तराखंड के जौनसार में मनाया जाता हैं। गिरीपार क्षेत्र में एक सप्ताह तक बूढ़ी दिवाली की धूम रहेगी।

यह है मान्यता

मान्यता है कि गिरिपार के लोगों को आम दिवाली के एक माह बाद जब भगवान राम के 14 वर्ष का वनवास व रावण का वध करने के बाद के अयोध्या वापस लौटने की जानकारी मिली, तो उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए देवदार और चीड़ की लकड़ियों की मशाल बनाकर रोशनी की। उन्होंने खूब नाच-गाना भी किया था। तब से गिरिपार क्षेत्र बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा शुरू हो गई। कुछ जगहों पर इस पर्व को बलिराज के दहन की प्रथा से भी जोड़कर मनाते हैं। आम दीपावली से ठीक एक माह बाद मनाए जाने वाले इस त्योहार की गरिमा किसी भी हालत में दिवाली से कम नहीं रहती। अलबत्ता गिरिपार के क्षेत्र में तो यही असली दिवाली है। सदियों से चली आ रही बूढ़ी दिवाली की परंपरा को आज भी गिरिपार क्षेत्र के लोग संजोये हुए हैं।

ऐसे मनाते हैं बूढ़ी दिवाली

आधी रात को कड़कड़ाती ठंड में भी लोग हाथों में मशाल लेकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर थिरकते-थिरकते पौराणिक लिम्बर नृत्य का आनंद उठाते हैं। एक सप्ताह तक गिरिपार क्षेत्र में मनाए जाने वाली बूढ़ी दिवाली का उत्सव अपने आप में बेहद खास और अनूठा है। अनूठा इसलिए क्योंकि बच्चे-बूढ़े महिलाएं और पुरुष सभी आस्था के इस महापर्व में खूब नाचते और झूमते नजर आते हैं। सतयुग से चली आ रही इस पौराणिक परंपरा को क्षेत्र के लोग सदियों बाद भी संजोए हुए हैं। आम दिवाली के साथ से बूढ़ी दिवाली के इस महापर्व की तैयारियां शुरू हो जाती है और अतिथि सत्कार के साथ सप्ताह भर नाच-गाने के साथ खूब मस्ती की जाती है।

सूखे मेवे, चिड़वा, अखरोट व शाकुली खिलाकर देते हैं बधाई

दिवाली की अगली अमावस्या पर बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। जिन इलाकों में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती हैं, वहां पर बर्फ भी पड़ती है। इन इलाकों में नवंबर व दिसंबर माह में तापमान माइनस में रहता है। बूढ़ी दिवाली के त्योहार में लोग परोकड़िया गीत, विरह गीत, भयूरी, रासा, नाटिया व स्वांग के साथ हुड़क डांस करते हैं। कुछ जगहों पर इस बूढ़ी दिवाली पर बढ़ेचू डांस करने की भी परंपरा है। कई जगहों पर रात में बुड़ियात डांस भी किया जाता है। इस दौरान लोग एक दूसरे को सूखे मेवे, चिड़वा, अखरोट व शाकुली खिलाकर बधाई देते हैं। बूढ़ी दिवाली के दौरान अलग-अलग दिन अस्कली, धोरोटी, पटांडे, सीड़ो व तेलपकी आदि पारम्परिक व्यंजन परोसे जाते हैं। दीपावली के अगले रोज पोड़ोई, दूज, तीच व चौथ आदि पर ग्रेटर सिरमौर के कईं गांव में सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन किया जाता है, जिसमें से कुछ जगहों पर रामायण व महाभारत का मंचन किया जाता है। विशेष समुदाय से संबंध रखने वाले पारंपरिक बुड़ेछू कलाकारों द्वारा इस दौरान होकू, सिंघा वजीर, चाय गीत, नतीराम व जगदेव आदि वीर गाथाओं गायन किया जाता है।

निभाते हैं ठिल्ला परंपरा

उक्त कलाकारों द्वारा फास्ट बीट के सिरमौरी गीतों पर बूढ़ा नृत्य भी किया जाता है। सदियों से क्षेत्र में केवल दीपावली अथवा बड़ी दिवाली तथा बूढ़ी दिवाली के दौरान ही बुड़ेछू नृत्य होता है। इसे बूढ़ा अथवा बुड़ियाचू नृत्य भी कहा जाता है। स्थानीय लोग बुड़ेछू दल के सदस्यों को नकद बक्शीश के अलावा घी के साथ खाए जाने वाले पारंपरिक व्यंजन भी परोसते हैं तथा इस परंपरा को ठिल्ला कहा जाता है।

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