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रिपोर्ट: कांग्रेस के ढहने जा रहे ये तीन किले, रिवाज बदलने की आहट तो नहीं!

*Khabar Aajtak: विशेष रिपोर्ट*

हजरात! हजरात! हजरात!… अगर आप हिमाचल विधानसभा चुनाव की भविष्यवाणी अभी से कर रहे हैं तो थोड़ा धीरज रख लीजिए. जुबान पर महज महीने भर का ही ताला जड़ लीजिए. क्योंकि, प्रदेश में सियासी जमीन ऐसी तैयार हुई है जिसमें ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है. सियासी गलियारों से Khabar Aajtak को ऐसी खबरें मिली हैं, जो आने वाले दिनों में आपको चौंका सकती हैं. हम आपको इसके बारे में डिटेल से जानकारी देंगे कि चुनावी रथ में दौड़ रहे कौन से घोड़े पाला बदलने वाले हैं. हाल के तीनों में कांग्रेस के तीन किलों के ढहने की बात आम हो चुकी है. गौरतलब है कि ये तीनों किले कांगड़ा लोकसभा क्षेत्र से हैं. लिहाजा, जल्दीबाजी न करते हुए अंत तक पढ़ने का साहस जरूर बनाएं

*क्या रिवाज बदलेगा?*

इसमें कोई भी संदेह नहीं कि ज़मीन पर बीजेपी के खिलाफ एक लहर सी बनी हुई है. लेकिन, इस लहर पर सी-सर्फिंग करने वाला सहसवार भी होना चाहिए. काफी लोगों को कांग्रेस से उम्मीद है कि पुराने रिवाज के मुताबिक सरकार बदलेगी और कांग्रेसी गुट सत्तासीन होगा. लेकिन, काफी हद तक स्थिति पहले की तरह नहीं है. कांग्रेस में स्टालवार्ट नेताओं की कमी है और ऊपर से पार्टी की गुटबाजी भी एक समस्या है. ऐसे में महंगाई, बेरोजगारी और कर्मचारियों के आक्रोश का पूरा लाभ कांग्रेस बतौर पार्टी उठा पाएगी, यह एक बड़ा सवाल है.

*कांगड़ा में कहां लगने वाली है सेंध?*

कांगड़ा लोकसभा क्षेत्र के उन सीटों पर बीजेपी की नज़र है जहां पर परंपरागत रूप से पार्टी की पृष्ठभूमि कमजोर रही है. इनहिमाचल को मिली खबर के मुताबिक यहां के कद्दावर नेताओं को पार्टी सीधे अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. बातचीत का दौर भी एक पूरा हो चुका है. गौरतलब है कि परंपरागत रूप से तीन कांग्रेस सीटों से बड़े नेता बीजेपी का दामन थामने वाले हैं. बस सही पोजिशनिंग के साथ सटिक वक़्त का इंतजार है.

*डेटा पॉलिटिक्स और कर्मचारियों की ताकत*

इसमें कोई शक नहीं कि अभी तक हिमाचल प्रदेश का कर्मचारी वर्ग मतदान में डिसाइंडिंग फैक्टर रहा है. सरकारें बदलने में इस वर्ग का हमेशा विशेष हाथ होता है. लेकिन, विगत 10 साल और खासकर 5 साल के भीतर इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में बड़े बदलाव हुए हैं. डेटा पॉलिटिक्स के दौर में चुनावी घमासान के कई वॉर फ्रंट हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तराखंड है. उत्तराखंड का कर्मचारी वर्ग भी नाराज था और तत्कालीन बीजेपी सरकार को उखाड़ फेंकने का दम भरा जा रहा था. सर्वे एजेंसियों के अलावा खुद बीजेपी की सर्वे टीम ने शुरुआत में कांग्रेस के बढ़त की रिपोर्ट दी. लेकिन, खेल यहीं से शुरू हुआ और तमाम पॉलिटिक्स बदल दी गई.

एक नजर आप हिमचाल के कुल वोटर बनाम सरकारी वोटरों की संख्या पर नजर करम करें. हिमाचल प्रदेश में 2017 के आंकड़ो के मुताबिक कर्मचारियों की कुल संख्या 2,20,215 है. जबकि, प्रदेश के टोटल वोटरों की संख्या 53,76,077 (इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट) है. कमाल की बात ये है कि इसमें 1 लाख से ऊपर वोटर नए जुड़े हैं. 53 लाख 76 हजार वोटरों में से अगर कर्मचारी वर्ग की संख्या को परिवार के तहत चौगुनी कर दें तो संख्या 10 लाख के करीब पहुंचती है. ऐसे में 43 लाख वोटरों को लेकर क्या स्थिति है? इनका झुकाव कैसा है? क्या इनमें से सभी बीजेपी के खिलाफ हैं या कांग्रेस के साथ हैं? असल में इन सवालों का जवाब अभी बिल्कुल नहीं दिया जा सकता. क्योंकि, डेटा पॉलिटिक्स के दौर में पार्टियां अब माइक्रो मैनेजमेंट में जुट रही हैं. इनमें बीजेपी का तगड़ा अनुभव भी है और ऊपर से कांग्रेस गुटबाजी और पैसे खर्च करने में कंजूसी दिखा रही है. लिहाजा, इस नजरिए से भी बीजेपी को मैदान से आउट करना एक बड़ी भूल होगी.

*नाचती है दुनिया नचाने वाला चाहिए*

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की वापसी के लिए भूमि काफी उर्वरक है. लेकिन, कांग्रेस के पास जरूरी संसाधन और सियासी खेत जोतने से लेकर बिजाई और रोपाई करने वाला अनुशासित कैडर नहीं है. ऊपर से वीरभद्र सिंह जैसा पार्टी पर नकेल कसने वाला लीडर भी नहीं है. गुटबाजी देखनी हो तो कांग्रेस की छोटी बड़ी रैलियों का आंकलन कर लीजिए. पोस्टर कार्यर्ताओं के साझा लीडर नहीं बल्कि एक जगह पर अपने-अपने लीडर मिलेंगे.

पिछले दिनों कांगड़ा में यूथ कांग्रेस की कार्यकारिणी की तीन दिवसीय मीटिंग चली. इस दौरान यूथ कांग्रेस के नेता अपने-अपने सरपरस्त नेताओं के होर्डिंग लगाए हुए थे. यही नहीं कांग्रेस की ‘बेरोजगार संघर्ष यात्रा’में भी आप आपसी खींचतान देख सकते हैं. लिहाजा, जो बीजेपी हरीश रावत जैसे नेतृत्व के बीच से जब उत्तराखंड खींचकर ला सकती है, तो क्या हिमाचल में रिवाज बदलने का पुरजोर कोशिश नहीं करेगी?

*भगदड़ मचने वाली है…*

उपरोक्त से भी ज्यादा गहरी जानकारी कांग्रेस के कुछ नेताओं को पहले से ही है. लिहाजा, अभी सियासत के दलदल को और करीब से भांपा जा रहा है. जैसे ही स्थिति स्पष्ट होगी एक भगदड़ तय मानी जा रही है. दिल्ली बीजेपी मुख्यालय के सूत्रों के मुताबिक रणनीति तैयार है. बस कवायद का इंतजार है. बिहार में नीतीश से घायल पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा किसी भी सूरत में अपने गृह क्षेत्र को गंवाना नहीं चाहते. लिहाजा, भीतरी मतभेदों को भुलाकर पुराने बागियों की घर वापसी हो रही है और कांग्रेसी सीटों पर डोरे डाले जा रहे हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि मालदार पार्टियों से अगर घी सीधी उंगली से नहीं निकलेगी तो टेढ़ी भी करने से गुरेज नहीं किया जाएगा. टेढ़ी उंगली का मतलब समझना हो तो बंगाल और महाराष्ट्र का उदाहरण ले सकते हैं.

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