अब बागियों का क्या होगा??
प्रदेश में सियासी उठापठक हुए लगभग 18 से 20 दिन हो गए हैं, अभी तक बागी विधायक प्रदेश से बाहर ही रहने को मजबूर हैं। बागी विधायकों के पास 2 ही ऑप्शन थे या तो वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करते या भाजपा का दामन थाम कर दोबारा से चुनाव लड़ लेते। मगर अब एक रास्ता इन बागी विधायकों का फिलहाल के लिए बंद हो चुका है। यह मामला 4-5 महीने लंबा चला गया है क्योंकि कल चुनाव आयोग लोकसभा चुनावों की तारीख घोषित करेगा और फिर आचार संहिता लग जाएगी। ऐसे में बागियों का भाजपा का दामन थाम कर दोबारा से चुनाव लडऩे का यदि कोई मूड भी था तो वह अब संभव नहीं हो पाएगा।
बीते कल ही सभी बागी विधायकों के घरों पर सीआरपीएफ भेज दी गई है, जिसमें 6 जवान एक विधायक की सुरक्षा देखेंगे, जिसमें 3 शिफ्टों में 2-2 जवान अपनी ड्यूटी देंगे। ऐसे में अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायद बागी विधायक अब हिमाचल वापसी करेंगे और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेंगे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पहली सुनवाई से यह साफ हो गया था कि इस मसले पर अच्छा खासा समय लगेगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का पहला प्रश्न इसी बात से शुरू हुआ कि इस मुद्दे को हाईकोर्ट क्यों नहीं लेकर गए, यानी प्रथम दृष्टया सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के मन में भी विषय की गंभीरता को लेकर सवाल उठे। हालांकि बाद में तर्क-वितर्क के बाद मसले को 18 तारीख तक के लिए टाला गया। और अब जानकारों का यह मानना है कि पहली सुनवाई से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबा जाएगा। पहले भी इस तरह के मामलों में कई दफा एक-डेढ साल तक का इंतजार करना पड़ा है।
अब ऐसे में बागी विधायकों को शायद अगले 4-5 महीने कम से कम यूं ही रुसवाई में काटने पड़ेंगे। और यह समय ज्यादा भी हो सकता है। ऐसे में कुछ राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट बागी विधायकों के फैसले पर स्टे भी लगाता है तो भी उन्हें वोटिंग राइट्स से वंचित रखा जाएगा और वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाएंगे। ऐसे में इंतजार करना ही एकमात्र रास्ता इन बागी विधायकों के पास होगा। इन सबके बीच राजेंद्र राणा के समर्थक तो खुसफुसाहट कर सोशल मीडिया पर उनका समर्थन कर भी रहे हैं, मगर इंद्रदत्त लखनपाल, देवेंद्र भुट्टो, चैतन्य के समर्थकों की कोई आवाज भी सुनने को नहीं मिल रही। और दूसरी तरफ सीएम सुक्खू ने भी बागियों को अलग-अलग नामों की संज्ञा देकर कहीं न कहीं अपना रुख साफ किया है। ऐसे में बागियों का कांग्रेस में फिर से शामिल होना यह कहीं न कहीं नामुमकिन सा लगता है।

